🎯राजस्थान की मुख्य झीलें rajasthan gk

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                      राजस्थान की मुख्य झीलें

राजस्थान की मुख्य झीलें



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राजस्थान में दो प्रकार की झीलें पाई जाती है।


खारे पानी की झीले


सांभर– जयपुर


पचपदरा– बाड़मेर


डीडवाना – नागौर, लूणकरणसर – बीकानेर, फलौदी- जोधपुर कावोद – जैसलमेर, रेवासा- सीकर, तालछापर- चुरू, कुचामन – नागौर, डेगाना- नागौर, पोकरण- जैसलमेर, बाप- • जोधपुर


मीठे पानी की झीलें जयसमंद– उदयपुर राजसमंद- राजसमंद बालसमंद- जोधपुर, आनासागर- अजमेर, फतेहसागर- उदयपुर, फायसागर- अजमेर, उदयसागर- उदयपुर, पुष्कर- अजमेर, कोलायत- बीकानेर, नक्की- सिरोही, सिलिसेढ़ – अलवर, पिछौला- उदयपुर, कायलाना- जोधपुर


खारे पानी की झीलें मुख्यतः उतरी पश्चिमी मरूस्थलीय भाग में पाई जाती है। इस क्षेत्र का टेथिस सागर का अवशेष होना यहाँ की झीलों के खारेपन का मुख्य कारण है। अरावली के पूर्वी भाग में पाई जाने वाली झीले मीठे पानी की झीलें है ।

साम्भर झील

यह झील जयपुर जिले में सांभर में स्थित यह भारत की दूसरी सबसे बडी (चिल्का के बाद) खारे पानी की झील हैं । यह देश में आन्तरिक जल क्षेत्र की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है। भारत के कुल नमक उत्पादन का 8.7 प्रतिशत यहां से उत्पादित होता है। इसकी लम्बाई द. पूर्व से उतर पश्चिम की ओर लगभग 32 किमी है। तथा चौडाई 3 से 12 किमी है। इसका अपवाह क्षेत्र 500 वर्ग किमी है। यहाॅ उत्तम किस्म का नमक होता है। यह झील तीन जिलों जयपुर, अजमेर एवं नागौर की सीमा बनाती है।

डीडवाना 

यह झील डीडवाना (नागौर) में स्थित है। पचपदरा बालोतरा (बाडमेर) में पचपदरा स्थान पर स्थित इस झील में उत्तम श्रेणी का नमक उत्पादन होता है। इस झील में खरवाल जाति के लोग मोरली झाड़ी के उपयोग से नमक के (क्रिस्टल) स्फटिक तैयार करते है।


फलौदी जोधपुर जिले के फलौदी कस्बे में स्थित है 


लूणकरणसर झील

यह झील बिकानेर जिले के लूणकरणसर कस्बे में स्थित है। यहां कम मात्रा में नमक का उत्पादन होता है । अन्य झीलें कावोद (जैसलमेर), डेगाना (नागौर) कुचामन (नागौर) तालछापर (चुरू) कछोर एवं रेवासा


जयसमंद (उदयपुर) सन् 1687 – 1691 की अवधि में उदयपुर के राणा जयसिंह ने गोमती नदी पर बांध बनाकर किया गया यह ताजे मीठे पानी की एशिया की सबसे बडी कृत्रिम झील है। इस झील में 7 टापू है। जिसमे भील व मीणा जनजाति के लोग रहते है। इनमें सबसे बड़े टापू का नाम बाबा का भगड़ा/भकड़ा है। और उससे छोटे का नाम प्यारी है। इसे ढेबर झील भी कहते है।


राजसमंद झील (राजसमंद)

इसका निर्माण मेवाड़ के राजा राजसिंह ने गोमती नदी का पानी रोककर (1662-76 ) इस झील का निर्माण करवाया गया। इस झील का उतरी भाग “नौ चौकी” कहलाता है। यही पर 25 काले संगमरमर की चट्टानों पर मेवाड़ का पूरा इतिहास संस्कृत में उत्कीर्ण है। इसे राजप्रशस्ति कहते है | जो की संसार की सबसे बड़ी प्रशस्ति है। राजप्रशस्ति अमरकाव्य वंशावली नामक पुस्तक पर आधारित है। जिसके लेखक – रणछोड़ भट्ट तैलंग है। इसके किनारे “घेवर माता” का मन्दिर है ।


पिछोला झील (उदयपुर)

14 वीं सदी में इस मीठे पानी की झील का निर्माण राणा लाखा के समय एक पिच्छू नामक बनजारे ने अपने बैल की स्मृति में करवाया। पिछौला में बने दो टापूओं पर ‘जगमन्दिर (लेक पैलेस)’ व ‘जगनिवास (लेक गार्डन पैलेस)’ महल बने हुए है। मुगल शासक शाहजहां ने अपने पिता से विद्रोह के समय यहां शरण ली थी । वर्तमान में इसे पर्यटन केन्द्र के रूप में इन महलों को “लेक पैलेस” के रूप विकसित किया जा रहा है। इस झील के समीप “गलकी नटणी” का चबूतरा बना हुआ है। इस झील के किनारे “राजमहल / सिटी पैलेस” है। सीसाराम व बुझडा नदियां इस झील को जलापूर्ति करती है। जगमन्दिर महल में ही 1857 ई. में राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान महाराणा स्वरूप ने नीमच की छावनी से भागकर आए 40 अंग्रेजो को शरण देकर क्रान्तिकारियों से बचाया था। जगनिवास महल का निर्माण महाराणा जगत सिंह ने 1746 ई. में करवाया था। महाराणा उदयसिंह ने इसकी मरम्मत करवाई थी..

उदयसागर झील महाराणा उदयसिंह द्वारा 1559 से 1564 ई. तक की अवधि में निर्मित की गई आयड नदी इसमें गिरती है। तथा इसके बाद उसका नाम बेड़च हो जाता है।


फतहसागर झील (उदयपुर)

राज के उदयपुर जिले में स्थित इस मीठे पानी की झील का निर्माण मेवाड के शासक जयसिंह ने 1678 ई. में करवाया। बाद में यह अतिवृष्टि होने के कारण नष्ट हो गई। तब इसका पुनर्निर्माण 1889 में महाराजा फतेहसिंह ने करवाया तथा इसकी आधार शिला ड्यूक ऑफ कनॉट द्वारा रखी गई। अतः: इस झील को फतहसागर झील कहा गया। इस झील में टापू है। जिस पर नेहरू उद्यान बना है। इस झील में शोर वेधशाला भी बनी है।


फतहसागर झील में अहमदाबाद संस्थान ने 1975 में भारत की पहली सौर वेधशाला स्थापित की। इसी झील के समीप बेल्जियम निर्मित टेलिस्कोप की स्थापना सूर्य और उसकी गतिविधियों के अध्ययन के लिए की गई। फतहसागर झील से उदयपुर को पेय जल की आपूर्ति की जाती है। उदयपुर के देवाली गांव में स्थित होने के कारण इसे देवाली तालाब भी कहा जाता है।


नक्की झील

राजस्थान के सिरोही जिले में माउंट आबू पर स्थित नक्की झील राजस्थान की सर्वाधिक ऊंचाई पर तथा सबसे गहरी झील है। झील का निर्माण ज्वालामुखी उद्भेदन से हुआ अर्थात यह एक प्राकृतिक झील है। मान्यता के अनुसार इस झील की खुदाई देवताओं ने अपने नाखुनों से की थी अतः: इसे नक्की झील कहा जाता है। यह झील पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। इस झील में टापू है। जिस पर रघुनाथ जी का मन्दिर बना है। इसके अलावा इस झील के एक तरफ मेंढक जैसी चट्टान बनी हुई है। जिसे “टॉड रॉक” कहा जाता है । आख्यानों के अनुसार इसका निर्माण देवताओं द्वारा अपने नाखूनों से खोदकर किया गया है। एक चट्टान की आकृति महिला के समान है। जिसे “नन रॉक” कहा जाता है। एक आकृति लड़का-लड़की जैसी है। जिसे “कप्पल रॉक” कहा जाता है। इसके अलावा यहाँ हाथी गुफा, चम्पा गुफा, रामझरोखा, पैरट रॉक अन्य दर्शनीय स्थल है। यह झील गरासिया जनजाति का आध्यात्मिक केन्द्र है। अतः: लोग अपने मृतको की अस्थियों का विसर्जन नक्की झील में ही करते है। इसके समीप ही “अर्बुजा देवी” का मन्दिर स्थित है । अतः: इस पर्वत को आबू पर्वत कहा जाता है।


आनासागर झील (अजमेर) 

अजमेर शहर के मध्य स्थित इस झील का निर्माण पृथ्वीराज चौहाण के दादा अर्णोराज ने सन् 1137 ई. में करवाया। पहाड़ों के मध्य स्थित होने के कारण यह झील अत्यन्त मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है। अतः मुगलशासक जहाँगीर ने इसके समीप दौलतबाग का निर्माण करवाया जिसे वर्तमान में सुभाष उद्यान कहते है । शाहजहां ने यहाँ पर 12 दरी का निर्माण करवाया । इसमें बांडी नदी का पानी आता है।


फॉयसागर झील

अजमेर में स्थित इस झील का निर्माण अंग्रेज इंजीनियर फॉय के निर्देशन में अकाल राहत परियोजना के तहत बांडी नदी के पानी को रोककर हुआ इसका पानी आनासागर में जाता है।

पुष्कर झील

राजस्थान के अजमेर जिले में अजमेर शहर से 11 कि.मी. की दूरी पर पुष्कर झील का निर्माण ज्वालामुखी उद्भेदन से हुआ है। यह झील भी प्राकृतिक झील है। यह राजस्थान का सबसे पवित्र सरोवर माना जाता है इसलिए इसे आदितीर्थ / पांचना तीर्थ / कोंकणतीर्थ / तीर्थो का मामा / तीर्थराज भी कहा जाता है। पुष्कर झील के बारे में मान्यता है कि खुदाई पुष्कर्णा ब्राह्मणों द्वारा कराई गई। अतः पुष्कर झील की संज्ञा दी गई। तथा किवदन्ती के अनुसार इस झील का निर्माण ब्रह्माजी के हाथ से गिरे तीन कमल के पुष्पों से हुआ जिससे क्रमश: वरिष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर, कनिष्ठ पुष्कर का निर्माण हुआ। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने यहां स्नान किया, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की, विश्वामित्र ने यहां तपस्या कि, वेदों को यहां अंतिम रूप से संकलन हुआ। इस झील के चारों ओर अनेक प्राचीन मन्दिर है। इनमें ब्रह्माजी का मन्दिर सबसे प्राचीन है। जिसका निर्माण 10 वीं शताब्दी में पंडित गोकुलचन्द पारीक ने करवाया था। इसी मन्दिर के सामने पहाड़ी पर ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री देवी का मन्दिर है। जिसमें माँ सरस्वती की प्रतिमा भी लगी हुई है । ( राजस्थान के बाड़मेर जिले में आसोतरा नामक स्थान पर एक अन्य ब्रह्मा मन्दिर भी है ।)


पुष्कर झील के चारों ओर 52 घाट बने हुए है । इन घाटों पर लोग अपने पित्तरों का लोकार्पण करते है। कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेला लगता है। दीपदान कि क्रिया होती है। आय की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा मेला है। यहां पर एक महिला घाट भी बना हुआ है। जिसे वर्तमान में गांधी घाट कहा जाता है। इसका निर्माण 1912 में मैडम मेरी ने करवाया था। गांधी जी की इच्छा पर उनकी अस्थियों का विसर्जन पुष्कर झील में ही किया गया था। इनमें जयपुर घाट सबसे बड़ा है । पुष्कर में राजस्थान में दक्षिण भारतीय शैली का सबसे बड़ा मन्दिर श्री रंग जी का मन्दिर भी बना हुआ है। पुष्कर में आई मिट्टी को साफ करने में 1998 में कनाडा सरकार ने आर्थिक सहायता प्रदान की। पुष्कर के राताडुंगा में नाथ पंथ की बैराग शाखा की गद्दी बनी है। पुष्कर के पंचकुण्ड को मृगवन घोषित किया।


सीलीसेढ झील

यह झील अलवर-जयपुर मार्ग पर स्थित है। इसके किनारे अलवर के महाराजा विनयसिंह ने 1845 में अपनी रानी के लिए एक शाही महल (लेक पैलेस) एक शाही महल व लॉज का निर्माण करवाया । जो आजकल लेक पैलेस होटल के रूप में चल रहा है।


कोलायत झील (बीकानेर)

राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित इस मीठे पानी की झील के समीप साँख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि का आश्रम है। इस आश्रम को राजस्थान का सुन्दर मरूद्यान” भी कहा जाता है। यह आश्रम एन एच 15 पर स्थित है। यहाॅ प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है। कोलायत झील की उत्पति कपिल मुनि ने अपनी माता की मुक्ति के लिए की । इस झील में दीप जला कर अर्पण किया जाता है। समीप ही यहां एक शिवालय है। जिसमें 12 शिवलिंग है।

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